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Jan 28, 2013

कृत्रिम चेतना: एक कृत्रिम और मानवद्रोही परिकल्पना

1997 में एक सुपर कम्प्यूटर ‘डीप ब्लू’ ने शतरंज के दिग्गज खिलाड़ी और विश्व विजेता गैरी कास्परोव को हरा दिया था, हालाँकि कास्पारोव ने भी इसे हराया था। इस हार को इस तरह पेश किया गया कि जैसे मनुष्य की चेतना से उच्च स्तर की चेतना विकसित हो गयी है। यह कम्प्यूटर इस खेल के लिए हर सेकण्ड में 2000 लाख चालों को ढूँढता था। इसके बावजूद गैरी कास्परोव ने उसे कुछ गेमों में हरा दिया था। कास्परोव की हार के मायने क्या हैं? क्या कम्प्यूटर इंसान की जगह ले लेगा? न्यूज़वीक पत्रिका ने इस मैच को ”दिमाग की आखिरी हार” करार दिया। और इस तरह कृत्रिम चेतना के विषय का पदार्पण विश्व को बदल डालने वाले विज्ञान के रूप में हो चुका था। लगभग हर बड़े विश्वविद्यालय में इस विषय पर शोध हो रहा है। परन्तु यह विषय जिस तरह पढ़ाया जाता है वह ग़लत है। आर्टिफिशियल इण्टेलिजेंस, कृत्रिम चेतना, कृत्रिम बुद्धिमता शब्द से असल में उम्मीद लगायी जाती है कि यह इंसान के सभी कार्य कर सकता है व उसे उसके हर कार्यक्षेत्र से हटा देगा। सिमोन, जिन्हें 1978 का अर्थनीति का नोबल प्राइज़ मिला था, का कहना था कि ‘आर्टिफिशिअल इण्टेलिजेंस मनुष्य को हर क्षेत्र से हटा देगा’। गूगल इन्क के रिसर्च डायरेक्टर पीटर नोर्विग मनुष्य की चेतना को अक्षम बताते हैं तथा उसे ठीक करने तथा उससे बेहतर सोचने वाली मशीनों की परिकल्पना को पेश करते हैं। लेकिन तमाम वैज्ञानिकों ने इन परिकल्पनाओं को सिरे से ख़ारिज किया है। ये परिकल्पनाएँ मानवद्रोही हैं तथा मौजूदा व्यवस्था की पैरोकार हैं। ये भाववाद व अनुभववाद की अधपकी खिचड़ी है। जाहिर सी बात है कि ऐसी परिकल्पनाओं को कोई भी संजीदा वैज्ञानिक या बुद्धिजीवी गम्भीरता से नहीं ले सकता है।
ख़ैर, ऐसी खोखली परिकल्पना सिर्फ संज्ञानात्मक विज्ञान (कॅागनिटिव साइंस) के क्षेत्र में ही नहीं लगभग हर ज्ञान क्षेत्र में व्याप्त है। यह व्यापक परिघटना है। तमाम क्षेत्रों में यंत्रें द्वारा मनुष्यों को पीछे छोड़ दिये जाने, मनुष्य की मेधा के किसी कृत्रिम शक्ति द्वारा पछाड़ दिये जाने की कल्पनाएँ की जा रही हैं। ऐसा क्यों है?
विज्ञान से हम प्रकृति को व्याख्यायित करते हैं। जैसे तारों की, धरती की तस्वीर जो हम अपनी आँखों से बनाते हैं वह सच्चाई का मामूली-सा प्रतिबिम्ब होती है। अन्तरिक्ष और धरती को करोड़ों मनुष्यों ने पिछले 4000 सालों से देखा और उसकी व्याख्याएँ की हैं। प्लेटो से लेकर केप्लर तक ने और आज स्टीफन हाकिंग और अन्य समकालीन वैज्ञानिकों तक ने धरती, तारों व ब्रह्माण्ड की बेहतर तस्वीर पेश की है। मनुष्य का ज्ञान इन्द्रियग्राह्य से बुद्धिसंगत ज्ञान में विकासमान रहा है। मनुष्यों की कई परिकल्पनाएँ ग़लत थी और अपनी ग़लतियों  से  सीखते  हुए  मनुष्य  कदम-ब-कदम  कला, साहित्य, प्राकृतिक विज्ञान आदि विषयों को गढ़ता गया है। मानव का सम्पूर्ण इतिहास उसके समूचे व्यवहार या कहें कर्मों का इतिहास है। प्राकृतिक विज्ञान का इतिहास मानव के उत्पादन सम्बन्धों और उत्पादक शक्तियों दोनों से जुड़ता है। यह भी लगातार विकासमान है परन्तु कभी-कभी ऐसे दौर आते हैं जब विज्ञान लम्बे समय तक अपेक्षाकृत रूप से ठहरावग्रस्त रहता है। समाज के आर्थिक आधार के अनुसार ही विचारधारा के तमाम प्रभावी रूप अस्तित्वमान होते हैं। और इन्हीं रूपों से वैज्ञानिक भी प्रभावित होता है व विश्लेषण करता है। “इंसान को एक वैज्ञानिक के तौर पर काम करने से पहले एक इंसान की तरह, अमूर्त रूप में नहीं, बल्कि एक विशिष्ट प्रकार के समाज के वास्तविक इंसान की तरह जीना होता है। अगर आधुनिक भौतिकी की बात करें—तो भौतिक वैज्ञानिक पहले एक इंसान है जिसे बुर्जुआ समाज के एक सदस्य की तरह जीना होता है”(कॅाडवेल)। ग़लत विचारों के चलते तथ्यों को लम्बे समय तक सही खाँचे में नहीं डाला जाता। कई घातों-प्रतिघातों, तीखे संघर्षो से गुज़रते हुए प्राकृतिक विज्ञान सही दिशा अख्तियार करता है। यह सही दिशा द्वंद्वात्मक नज़रिये की है। आज बुर्जुआ विज्ञान द्वंद्वात्मक राह की जगह तुक्केबाजी का सहारा लेता है। इसी तुक्केबाजी से वह मंथर गति से विकसित होता है। लेनिन के शब्दों में वे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद द्वारा खोले दरवाजे को नहीं देखते हैं।” यह पतनोन्मुख बुर्जुआ समाज की आम गति है। इसकी पतनशीलता मकड़जाल की तरह हर ज्ञान क्षेत्र से चिपकी हुई है। हर ज्ञान शाखा में संकट व्याप्त है। कृत्रिम चेतना का पूरा सिद्धान्त वास्तव में बुर्जुआ समाज, मूल्यों-मान्यताओं और आर्थिक आधार द्वारा पैदा की गयी विकृतियों में से एक है। इस लेख में इस परिकल्पना के निष्कर्षों और मुख्य तर्कों का आलोचनात्मक विश्लेषण रखा गया है। हम सबसे पहले इसके राजनीतिक निष्कर्षों और पूर्वाग्रहों पर चोट करेंगे। इस व्याख्या के बाद इसकी चीरफाड़ करना बेहद आसान होगा। मौजूदा प्रयोगों और बुर्जुआ वैज्ञानिकों की माथापच्ची पर एक नज़र बुर्जुआ पतनोन्मुख समाज पर भी रोशनी डालेगी। रोजर पेनरोज़ सरीखे कई भौतिकशास्त्रियों और दार्शनिकों (ड्रायफस, चोम्स्की) ने भी कृत्रिम चेतना की आलोचना की है परन्तु यह सब या तो तकनीकी पहलुओं पर चोट करते हैं (मुख्यतः गोडेल के गणितीय अपूर्णता के सिद्धांत के आधार पर जिसका सार ज्ञान की सापेक्षता है) या फिर भाववादी दृष्टिकोण से प्रस्थान करते हैं। मार्क्सवादी पद्धति के कुतुबनुमा के बग़ैर वैज्ञानिक परिकल्पनाएँ और उसको साबित करने के लिए किये जा रहे प्रयोग संयोग और तुक्केबाजी की धुँध में भटक रहे हैं।

कृत्रिम चेतना की राजनीति
पूँजीवाद का उदय माल-उत्पादन के लिए लगने वाली बड़ी-बड़ी मशीनों के दौर से हुआ था। स्टीम इंजन की खोज, प्रिण्टिंग, कम्प्यूटर, एरोप्लेन सभी इसी युग की खोजें हैं और तभी से ही श्रम और पूँजी की ताकतें भी एक दूसरे से टकराती रही हैं। मशीनीकरण ने श्रम की उत्पादकता का स्तर बढ़ाया तो दूसरी ओर बड़ी आबादी को बेरोज़गार किया जिसे अपना घर, ज़मीन छोड़ कर विस्थापित होना पड़ा। फैक्टरियों में नयी नयी मशीनरी लगायी जाती है जिससे पूँजीपति श्रम की उत्पादकता बढ़ाकर कम समय में ही पहले से ज़्यादा उत्पादन करने में सक्षम हो जाता है। वह श्रम से अतिरिक्त मूल्य निचोड़ने की अपनी दर को बढ़ा लेता है। मशीनीकरण के ज़रिये पूँजीपति लगातार अपनी लागत को कम करने का और अपने मुनाफे को बढ़ाने का प्रयास करता रहता है। बाज़ार की प्रतिस्पर्द्धा में यह एक हवस में तब्दील हो जाता है क्योंकि बाज़ार में वही पूँजीपति टिक सकता है जो कीमतों के युद्ध में विजयी होता है, यानी कि अपने उत्पाद की कीमत कम-से-कम रखता है। और कीमतों को कम से कम वही पूँजीपति रख सकता है जो लागत को कम-से-कम रखे, और लागत को कम-से-कम वही पूँजीपति रख सकता है जो मशीनीकरण और स्वचालन का जमकर इस्तेमाल करे ताकि श्रम की उत्पादकता को बढ़ाकर श्रमिकों की ही छँटनी की जा सके। यही हवस पागलपन की हद तक पहुँचती है, और बुर्जुआ विचारजगत में कई परिकल्पनाओं को जन्म देती है। वह एक ऐसे रोबोट की परिकल्पना तक जाती है जो उसकी फैक्टरी से मज़दूरों को ग़ायब कर देती है। यह तर्क हवाई है और लेख के अगले हिस्से में हम इसे तार-तार करेंगे परन्तु अभी इसे आगे बढ़ाकर देखते हैं। बुर्जुआ समाज का कलाकार, अर्थनीतिज्ञ, राजनीतिज्ञ या वैज्ञानिक एक ऐसी मशीनरी की कल्पना करता है जो लगातार मुनाफा बढ़ायेगी और इंसान को उत्पादन के मानसिक और शारीरिक कार्य से मुक्त कर देगी! इस परिकल्पना को अर्थनीति के स्तर पर ‘तकनोलॉजिकल बेरोजगारी’ कहते हैं जिस पर कई बुर्जुआ अर्थनीतिज्ञ अलग-अलग मत रखते हैं। वैसे अगर इस तर्क को मान लिया जाये तो होगा यह की उत्पादन में श्रम करने वाले रोबोट होंगे! एक बहुत बड़ी आबादी उत्पादन से बाहर धकेल दी जायेगी और कुछ पूँजीपति पृथ्वी की सम्पदाओं का दोहन करेंगे! या थोड़े समय बाद कुछ बेहतर मशीनें खुद पूँजीपतियो को हटाकर पूरी दुनिया पर कब्ज़ा कर लेंगी। बड़ी भद्दी सोच है! परन्तु यह महज़ सोच है! सबसे पहले तो यह एक फन्तासी है और अगर इस फन्तासी को यथार्थ मान लिया जाये तो बेरोज़गार आबादी इस निजा़म के खि़लाफ विद्रोह कर देगी। यह फन्तासी मुख्यतः मशीनों आदि को ऐसा औजार बनाकर पेश करती है जिसे हराना मनुष्य के दम की बात नहीं है! परन्तु यह बार-बार भूल जाती है कि हर-हमेशा डेविडों ने गोलिएथों को गुलेल से हराया है! और यह कि ”जनता के महासागर में बड़े-बड़े हथियारों के जखीरे डूब जाते हैं”(माओ)। यह परिकल्पना कभी उपन्यासों, कविताओं, फिल्मों, गानों में, यानी की अधिरचना का एक अंग बनकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। असिमोव की पूरी रोबोट  शृंखला, इ.रोबोट, मेट्रिक्स, ए.आई. सरीखी फिल्में परिकल्पनाओं में आर्थिक हवस का मूर्त रूप होती हैं। हर व्यवस्था का आर्थिक आधार अपने अनुकूल अधिरचना खड़ा करता है जो उसके विकास में मददगार होता है। आदि काल से तमाम जादुई परिकल्पनाएँ इसी तरह मनुष्य की चेतना  को उसके मूलाधार से बाँधे रखने का काम करती हैं। कृत्रिम चेतना का भी वास्तविक कार्य यही है। यह वैज्ञानिक परिकल्पना पूँजीवादी मूलाधार का समर्थन करती है और श्रम के शिविर पर सवाल खड़ा करती है, जनता के प्रतिरोध को नकारती है और उसके अजेय शौर्य को भोंडा करके पेश करती है। पूँजीवाद मनुष्य को उसकी ही रचना के खिलाफ खड़ा करता है; यह फन्तासी मनुष्य को उसकी ही रचना के खि़लाफ खड़ा कर उसे मनुष्य से अपराजेय बना देती है। यह विडम्बना है कि पहले तो यह व्यवस्था करोड़ों इंसानों को बेरोज़गार रखती है, उन्हें भूखा रखती है, उनके श्रम शक्ति सम्पन्न शरीर को और मष्तिष्क को निष्क्रिय रखती है और दूसरी तरफ उस तक्नोलोजी में पैसा लगाती है जिससे कि मानव को हटाकर ”चेतना सम्पन्न रोबोट” बनाया जा सके। सामान्य चेतना क्या कहती है? तर्क क्या कहता है? क्या एक सीधा-सादा तर्क यह नहीं है कि जिस देश में रोज 9,000 बच्चे भूख और कुपोषण से मरते हों तो क्या वहाँ 58 लाख टन अनाज गोदामों में सड़ाना बेवकूफी नहीं है? इस सवाल को हल करने के लिए किसी सुपर कम्पयूटर की ज़रूरत नहीं है जो एक सेकण्ड में 2000 लाख चाल सोच सकता है। यह महज़ कल्पनालोक में अच्छी लगती है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से यह महज़ परिकल्पना के स्तर तक मौजूद है। यहाँ हम आगे बढ़कर इसके उस तर्क पर चोट करेंगे जो मनुष्य की रचना का अमूर्तिकरण इस हद तक करता है कि यह अमूर्त रचना जीवित हो उठती है।

कृत्रिम चेतना का दर्शन
कृत्रिम चेतना का विचार दूसरे विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आया। कई देशों की पूँजीवादी सरकारों ने बढ़-चढ़कर इसमें पैसा लगाया। ट्यूरिंग का कम्प्यूटेशन का सिद्धान्त इस क्षेत्र का मुख्य स्रोत था। मनुष्य के तंत्रिका तन्त्र को बहुत ही निम्न स्तर के तन्त्र से समझने कि कोशिशें की गयीं। ट्यूरिंग ने 1950 में ”कम्प्यूटिंग मशीनरी एंड इंटेलिजेंस” नामक अपने लेख में आर्टिफिशियल इण्टेलिजेंस का आधार रखा। विख्यात ट्यूरिंग टेस्ट जो किसी मशीन के इण्टेलिजेंस का टेस्ट होता है इसी लेख में प्रस्तुत किया गया। 1950 के दौर में मैकार्थी, मिन्स्की, नेविल, सिमोन आदि वैज्ञानिकों ने इसको आगे बढाया। यही वह दौर था जब अमेरिका भी ऐसे ही कृत्रिम मशीन अनुवादक की तलाश में था जो रुसी लेखों को अनुवादित कर सके जिससे कि स्पुतनिक के बारे में अमरीका को पूरी जानकारी हो। परन्तु जल्द ही यह लड़खड़ा कर गिर गया। आर्टिफिशियल इण्टेलिजेंस उम्मीद पर खरा नहीं उतरा और 1973 में इंग्लैण्ड ने लाईटहिल रिपोर्ट के आधार पर इस अनुसंधान को सिर्फ दो विश्वविद्यालयों के अलावा हर जगह बन्द कर दिया। पर फिर से 1982 में कृत्रिम चेतना के विकास के क्षेत्र में जमकर निवेश हुआ जो कि 1988 तक आते आते फिर से धराशायी होकर गिर पड़ा। परन्तु फिर से एक बार इस क्षेत्र में निवेश होना शुरू हुआ और कई सफल कम्प्यूटर बने जो मनुष्य द्वारा निर्धारित कार्यों को कर सकते थे। शोध आकलन, सर्जिकल ऑपरेशन, लॉजिस्टिक, कम्प्यूटर गेम, प्ले स्टेशन, डेटा माईनिंग, अन्तरिक्ष विमान, हथियारों, गूगल सर्च इंजिन व अन्य सर्च इंजन में ”कृत्रिम चेतना” की अवधारणा का जमकर प्रयोग होने लगा है। परन्तु आज 70 साल बीत जाने के बाद भी चेतन मशीन की परिकल्पना ने जीवन नहीं प्राप्त किया है और न ही करेगी चाहे इसको लेकर पीटर नोर्विग कितना ही चिल्ला लें।
यह बात हम यूँ ही नहीं कह रहे हैं। इसके कारण वैज्ञानिक और दार्शनिक धरातल पर मौजूद है। दार्शनिक धरातल वैज्ञानिक धरातल का ही सामान्यकरण है। आखिर यह कृत्रिम चेतना क्या है? वास्तव में, ये कम्प्यूटर प्रोग्राम है। एक कम्प्यूटर प्रोग्राम अपने कण्डीशनल ऑपरेटरों के ज़रिये तमाम सम्भावित परिघटनाओं के बारे में कुछ पूर्वाकलन कर सकता है। उन्नत से उन्नत कम्प्यूटर अपने गणितीय ऑपरेटरों के ज़रिये कुछ ही सम्भावित परिस्थितियों के कुछ ही सम्भावित नतीजों के कुछ ही सम्भावित पूर्वानुमान लगा सकते हैं। ये प्रोग्राम दिये गये तथ्यों, आँकड़ों और गणनाओं पर ही चल सकते हैं, और नयी गणनाएँ भी ये उनके आधार पर ही कर सकते हैं। मनुष्य के पास एक शक्ति होती है, जो किसी भी कम्प्यूटर प्रोग्राम के पास नहीं हो सकती है-कल्पना और भावना की शक्ति। और अधिकांश निर्णयों के आधार में हर-हमेशा कल्पना, भावना और तर्कों तथा तथ्यों की भूमिकाएँ होती हैं। निश्चित तौर पर, ऐसे में कोई उन्नत से उन्नत कृत्रिम चेतना का प्रोग्राम सभी सम्भावित परिस्थितियों का आकलन नहीं कर सकता। ऐसे में कोई भी नयी अकल्पित, अनाकलित लेकिन निश्चित तौर पर सम्भावित परिस्थिति उस कृत्रिम चेतना के कार्यक्रम को दुष्क्रिया की स्थिति में डाल सकती है; उनकी ही भाषा में कहें तो ‘सिस्टम एरर’ पैदा कर सकती है! ये सारे कम्प्यूटर और उन्हें चलाने वाले सॉफ्टवेयर और उनकी एल्गोरिथम कैसे मनुष्य के मस्तिष्क के समान सोच पाएँगे? ये कम्पयूटर सिलिकॉन और जर्मेनियम से बनी चिप में इंसान द्वारा तय गणितीय मानकों पर आँकड़ों को व्यवस्थित करते हैं व उनसे आकलन निकालते हैं; क्रिस्टोफेल कॉडवेल के शब्दों में यह कम्प्यूटर ऑपरेटेबिलिटी के ठप्पे से भरा होता है यानी यह आँकडों को जमा करने और आकलन के मानवीय तरीकों का प्रतिबिम्ब मात्र है और कम्प्यूटर पर लगे सिलिकॉन और जेर्मेनियम का वजन बढ़ाने और करोड़ों चिप लगाने के बावजूद यह यही काम करेगा! यह मनुष्य की तरह द्वंद्वात्मक तौर पर नहीं सोच सकता है। चाहे वह कास्पोरोव से शतरंज खेलने वाला डीप ब्लू हो या नोर्विग का गूगल सर्च इंजन! शतरंज के खाने अगर बढ़ा दिया जाये या घोड़े की चाल बदल दी जाये तो कम्प्यूटर हार जायेगा। एक और बोर्ड गेम ‘गो’ में कृत्रिम चेतना वाले कम्पयूटर को नौसिखिये भी हरा देते हैं! और वैसे भी हमारा ब्रह्माण्ड तो इन खेलों के नियमों से बंधा नहीं है, पदार्थ लगातार विकासमान है और पदार्थ के हर स्तर पर अलग नियम काम करते हैं! उन्नत से उन्नत कम्प्यूटर जो काम सबसे अच्छी तरीके से कर सकता है वह यह है कि वह मनुष्य द्वारा सिखाये रास्ते पर अधिकतम सम्भव सटीकता से चले। दरअसल, यह मनुष्य की चेतना का ही प्रतिबिम्ब है! मनुष्य और मशीन को अलग करके नहीं देखा जा सकता है यह उसके अजैविक जगत का हिस्सा है। यह मशीन मानसिक श्रम करने का औज़ार है जिस तरह हथोड़ा शारीरिक श्रम को आसान बनाने का औज़ार होता है। परन्तु कई वैज्ञानिक प्रचारित करते हैं वे अलग से नयी चेतना का निर्माण कर रहे हैं और वे कदम-कदम पर इन कम्प्यूटरों की कभी जानवरों से तो कभी मनुष्य से तुलना करते रहते हैं। गूगल के पीटर नोर्विग ने अपनी किताब में लिखा है कि जैसे चिड़िया कि उड़ान को हम कृत्रिम रूप से हवाई जहाज़ से सृजित कर सकते हैं वैसे हम चेतना को भी किसी आधुनिक मशीन में सृजित कर सकते हैं। यह भाववाद है! आप जो चाहे वह नहीं कर सकते! कल आप इसी तर्क के आधार पर कहेंगे चलिए नयी धरती बनाते हैं, चलो क्यों न नया ब्रह्माण्ड बनाया जाये! खैर कल्पनालोक से बाहर निकलते हैं! हॉब्स को उद्धृत करते हुए वह मस्तिष्क को कैल्कुलेटर बताते हैं जिसमे चेतना गणितीय सूत्रों के द्वारा प्रवेश करती है! चेतना आखिर है क्या? रंग, खुशबू, ठोस, गीला, कर्कश आदि क्या हैं? क्या यह गणितीय सूत्र हैं जिन्हें कम्प्यूटर को समझाया जा सकता है? मनुष्य की सामाजिक चेतना पिछले 4000 साल से विकास कर रही है। इसके विकास का इतिहास मनुष्यता का इतिहास है, यह मनुष्य के आत्मगत जगत और उसके वस्तुगत जगत का इतिहास है। दरअसल मनुष्य को वस्तुगत और आत्मगत में अलग नहीं किया जा सकता है, जैसा कि फायरबाख ने कहा है कि मनुष्य वस्तुगत-आत्मगत होता है। मनुष्य का आत्मिक और भौतिक जगत एकीकृत होते हैं। यह वह रेखा है जो यांत्रिक भौतिकवादी को द्वंद्वात्मक भौतिकवादी से अलग करती है। न मशीन द्वंद्ववाद समझ सकती है और न ही यांत्रिक भौतिकवादी! इसी कारण कृत्रिम चेतना का यह सिद्धांत मानवद्रोही है। यह मानवीय सारतत्व पर चोट करता है। यह मानवीय सार को एक मशीन द्वारा बनाने कि बात करता है। परन्तु ”मानवीय सारतत्व अमूर्त रूप में हर व्यक्ति में विराजमान नहीं होता है। वास्तव में, यह सम्पूर्ण सामाजिक रिश्तों का समुच्चय है”(मार्क्स)। यह मार्क्सवाद के ज्ञान सिद्धांत के खि़लाफ जाता है। श्रमशील मनुष्य को चिन्तनशील मनुष्य से अलग नहीं किया जा सकता है।
इसलिए यह समझना कोई ज़्यादा मुश्किल काम नहीं कि ज्ञान एक वैज्ञानिक वस्तु होता है जिसे मशीन समझ नहीं सकती है। वह बस अनुकरण कर सकती है। समझने के लिए आलोचनात्मक विवेक चाहिए, एक द्वंद्वात्मक विचार प्रणाली चाहिये। परन्तु कृत्रिम चेतना के अनुसार ये मशीनें मानव से बेहतर सोचेंगी और आगे भी बढेंगी। यह सब कोरी बकवास है। यह परिकल्पना ज्ञान को महज प्लेटो, अरस्तु, सुकरात, हेगेल, माइकेलेंजेलो, आइन्स्टाइन आदि के अन्दर ढूँढती है न कि सम्पूर्ण मानव समाज के व्यवहार में। यह मानवीय संघर्ष के इतिहास को, व्यवहार से पैदा हुए और विकसित होते ज्ञान कि प्रक्रिया को ढाँपता है। यह सोच मेहनतकश जनता को कोल्हू का बैल समझती है जिसे चलाने के लिये विशिष्ट बुद्धि सम्पन्न व्यक्तियों की ज़रुरत होती है और अब यह कार्य कृत्रिम चेतना करेगी। यह बुर्जुआ राज्य सत्ता की सेवा में लगने को तत्पर है और वस्तुतः कृत्रिम चेतना के प्रयोग से निकले सॉफ्टवेयर सर्विलिएंस में प्रयोग हो रहे हैं। आर्टिफिशियल इण्टेलिजेंस सरीखी परिकल्पनाएँ बुर्जुआ विज्ञान की सीमाओं और खोखलेपन को सतह पर ले आती हैं।
असल में कृत्रिम चेतना के प्रयोग और उससे निकले कम्प्यूटर क्या हैं? और वे कैसे प्रयोग में आयेंगे? ये कम्प्यूटर निश्चित तौर पर मानवीय श्रम की उत्पादकता को बढ़ाएँगे, बेहतर मशीनें बनेंगी परन्तु यह ध्यान में रखना होगा कि पूँजीवाद में विज्ञान पूँजी का गुलाम होता है व मुनाफे की सेवा में लगता है। इसका एक घिनौना उदाहरण एक कृत्रिम चेतना की अवधारणा पर आधारित रोबोट रोक्सी है जो सिर्फ इसलिये बनायी गयी है की वह आदमी की कामवासना को शान्त कर सके! पूँजीवाद का संकट विज्ञान के स्तर पर भी मौजूद रहता है, बावजूद इसके विज्ञान और तकनीक विकासमान रहती हैं, भले ही वह गति मन्थर हो। ऐसे में विज्ञान का रुग्ण और विकृत इस्तेमाल होता है। वह युद्धक हथियार बनाने, रॉक्सी जैसे रोबोट बनाने और उम्र घटाने की दवाइयाँ बनाने आदि में इस्तेमाल किया जाता है। कृत्रिम चेतना शब्द गलत है और इस तकनीक का मूल प्रतिबिम्ब नहीं करता है।
कृत्रिम चेतना वास्तव में कुछ भी नहीं है। यह मनुष्य की चेतना का ही विस्तार है। यह स्वचालन की ही एक नयी मंजिल है। कुछ मानवीय कार्यों को, जो कि पूर्वाकलित किये जा सकते हैं, अंजाम देने के लिए कुछ ऐसे उपकरणों का निर्माण किया जा सकता है और किया जा रहा है जो स्वयं एक हद तक पहले से दर्ज और आकलित निर्णय ले सकते हैं। लेकिन यह कहना कि कृत्रिम चेतना से लैस रोबोट किसी दिन मनुष्य का स्थान ले लेंगे, एक निहायत मूर्खतापूर्ण सपना है। ऐसा कभी नहीं हो सकता है। जो मानव चेतना की प्रकृति और चरित्र को नहीं समझते हैं, वही इस खोखले सपने के नशे में डूब सकते हैं।

Nov 27, 2012

वामपंथी बुद्धिजीवी, ‘दायित्वबोध’ के पूर्व सम्पादक विश्वनाथ मिश्र का लखनऊ में निधन


लखनऊ, 26 नवम्बर. वामपंथी बुद्धिजीवी, ‘दायित्वबोध’ पत्रिका के सम्पादक विश्वनाथ मिश्र का अचानक दिल के दौरे से आजलखनऊ में निधन हो गया। विगत दो सप्ताह से मस्तिष्काघात की चिकित्सा के लिए वे स्थानीय विवेकानन्द पालीक्लीनिक में भरती थे और एक ऑपरेशन के बाद उनकी स्थिति में कुछ सुधार भी था।

                  विश्वनाथ मिश्र का निधन हिन्दी वैश्
विक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। करीब 16 वर्षों तक उन्होंने प्रसिद्ध वामपंथी वैचारिक पत्रिका ‘दायित्वबोध’ का सम्पादन किया। दर्शन और अर्थशास्त्र विषयक सैकड़ों लेखों का अनुवाद किया और विविध विषयों पर प्रचुर लेखन किया। पेशे से वे कृषि विज्ञानी (गोरखपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध नेशनल पी.जी. कालेज में प्राध्यापक) थे और अभी कुछ ही दिनों पहले अवकाश प्राप्त किया था। विश्वनाथ जी के ज्ञान का दायरा प्राचीन भारतीय दर्शन, धर्मशास्त्र, संस्कृत महाकाव्य और इतिहास और भाषाशास्त्र से लेकर शेक्सपियर, बर्नार्ड शा, रसेल, डिकेन्स आदि की कृतियों तक विस्तारित था। माक्र्सवादी दर्शन का उनका अध्ययन गहन था। साथ ही वे क्वाण्टम भौतिकी और सापेक्षिकता सिद्धान्त के भी अधिकारी विद्वान थे। कृषि विज्ञान की लोकप्रिय पाठ्य-पुस्तकें भी उन्होंने लिखी थीं।
                         विश्वनाथ मिश्र देवरिया के एक निम्न मध्यवित्त परिवार में पैदा हुए थे। कानपुर स्थित चन्द्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की थी। जीवनपर्यन्त वे एक छोटे से कस्बे में अध्यापन करते रहे और सामाजिक आन्दोलनों में भी सक्रिय रहे। आज ऐसी प्रतिभाएं महानगरों के विश्वविद्यालयों और संस्कृति-केन्द्रों में भी देखने को नहीं मिलतीं। संगोष्ठियों में विश्वनाथ मिश्र की ज्ञान की गहराई और तर्क कुशाग्रता का लोहा देश के ख्यातिलब्ध विद्वानों को भी मानना पड़ता था। विश्वनाथ मिश्र यश और पद की चूहा दौड़ में शामिल हुए बिना जीवन पर्यन्त ज्ञान-साधना करते रहे और जनता के प्रति उनका सरोकार बना रहा।
1994 में ‘राहुल फाउण्डेशन’ की स्थापना में भी उनकी अग्रणी भूमिका थी। ‘दायित्वबोध’ के अतिरिक्त मजदूरों के अखबार ‘बिगुल’ और छात्र-युवा पत्रिका ‘आह्वान’ में भी वे नियमित लिखते रहते थे। लखनऊ, दिल्ली, गोरखपुर, लुधियाना और चण्डीगढ़ में राहुल फाउण्डेशन, अरविन्द ट्रस्ट, आह्वान और बिगुल से जुड़े बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बैठकें करके विश्वनाथ मिश्र को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित की।
साइंटिस्ट्स फॉर सोसाइटी 

Oct 16, 2011

आधुनिक भौतिकी और भौतिकवाद के लिए संकट





1. परिचय
क्वाण्टम भौतिकी और सापेक्षिकता सिद्धान्त के आने, एक सूक्ष्म विश्व के सामने आने, और उसमें न्यूटनीय भौतिकी के नियमों के लागू न होने के कारण, 20वीं सदी का मध्य आते-आते वैज्ञानिकों की बडी संरव्या का मत यह हो गया था कि आधुनिक भौतिकी संकट का शिकार है। पिछले 30-35 सालों के दौरान भी कोई सिद्धान्त भौतिकी के समकालीन बुनियादी सवालों का पूरा समाधान पेश नहीं कर पाया है, और पूरे ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति से लेकर, उसके विकास और समय की अवधारणा पर शोध और प्रयोग जारी हैं। इन शोधों और प्रयोगों पर पूरे भौतिक विश्व की हमारी भावी समझ निर्भर करती है। लेकिन यह भी सच है कि क्लासिकीय भौतिकी के लिए संकट पैदा कर देने वाली 20वीं सदी ने प्रकृति और ब्रम्हाण्ड के बारे में हमारी समझदारी को एक नये धरातल पर भी पहुँचाया। पिछले 100 सालों में सापेक्षिता का सिद्धान्त, क्वाण्टम सिद्धान्त, स्टैण्डर्ड माॅडल आदि ने पदार्थ जगत के बारे में हमारे बोध को सूक्ष्म एवं गहन बनाया है। पुरानी अवधारणाओं को हटाकर नये तथा बेहतर सिद्धान्त खुद को स्थापित करते रहे हैं, हालाँकि समय के साथ उनमें से कई ग़लत भी साबित हो गये।
भौतिकी में हुए इन विकासों से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि पदार्थ जगत के हर विशिष्ट स्तर के अपने विशिष्ट नियम होते हैं, जैसे न्यूटोनीय यांत्रिकी और क्वाण्टम यांत्रिकी के नियम एक दूसरे से भिन्न होते हैं। इसका कारण यह है कि एक का रिश्ता वृहत (मैक्रो) विश्व की गति से है तो दूसरे का सूक्ष्म (माइक्रो) विश्व की गति के साथ। तकनोलाजी में हुए विकास के कारण ऐसी उन्नत मशीनों का निर्माण सम्भव हो सका जिससे पदार्थ के ऊपरी संस्तर को भेदकर उसके सूक्ष्म विश्व तक पहुँचना सम्भव हुआ। जब-जब यंत्रों के माध्यम से मानव प्रेक्षण का स्तर गहरा होता गया और अधिक से अधिक सूक्ष्म धरातल पर उतरा, तब-तब चारों तरफ संकट का शोर मचा। एक बुजुर्ग ब्रिटिश वैज्ञानिक ने 1930 के दशक में सापेक्षिकता के सिद्धान्त, अनिश्चितता के सिद्धान्त और क्वाण्टम भौतिक के उदय के बाद कहा था कि काश मैं 20 वर्ष पहले मर गया होता, क्योंकि अब जीवन के इस दौर में नयी खोजों के साथ ऐसा लग रहा है मानो अब तक जो कुछ जाना और समझा वह सब झूठ था! यह एक वैज्ञानिक द्वारा इस आभासी संकट की सबसे त्रासद अभिव्यक्ति थी।
बहरहाल, जब-जब विज्ञान में ऐसे विकास और खोजें हुईं जिन्होंने समकालीन सिद्धान्तों और अवधारणाओं पर प्रश्न खड़ा कर दिया, तब-तब एक सैद्धान्तिक धुंध का वातावरण बना। इसके कारणों की हम आगे पड़ताल करेंगे। लेकिन हर बार बुर्जुआ मीडिया तथा प्रतिक्रियावादी वैज्ञानिकों को यह मौका मिल जाता था कि वे इस सैद्धान्तिक अविश्वास, अज्ञेयवाद और अस्पष्टता का लाभ उठाकर पदार्थ के होने-न होने को लेकर ही सवाल खड़े करने लगें, पदार्थ के पैदा होने में किसी दिव्य हस्तक्षेप की बात करने लगें, यथार्थ की अवधारणा पर ही सवाल खड़ा कर दें। फिलहाल, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और प्रकृति से जुड़े सवालों को लेकर चल रहे महाप्रयोग, यानी हाईड्राॅन कोलाइडर का सर्न प्रयोग, के दौरान भी इसी प्रकार की बातें मीडिया और प्रतिक्रियावादी वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा की जा रही हैं। मीडिया ‘हिग्स बुसाॅन’ की अवधारणा को समझे बिना ही ले उड़ा है और इण्डिया टीवी, ज़ी टीवी जैसे बाज़ारू चैनलों ने तो घोषणा भी कर डाली सर्न प्रयोग ने तथाकथित ‘गाॅड पार्टिकल’ ढूँढ निकाला है, जिससे कि ईश्वर का अस्तित्व वैज्ञानिक तौर पर साबित हो गया है। भला हो सर्न प्रयोग के वैज्ञानिकों का कि उन्होंने बार-बार बयान देकर यह स्पष्ट कर दिया कि अव्वलन तो हिग्स बुसाॅन की मिलने की संभावना ही नगण्य है, और दूसरा यह कि हिग्स बुसान, या जैसा कि मीडिया इसे कहना पसन्द करता है, ‘गाॅड पार्टिकल’ के मिलने से भी ईश्वर के अस्तित्व की किसी भी रूप में पुष्टि नहीं होती है। स्पष्ट है कि ज्ञान और अज्ञान के बीच के द्वन्द्व के जरिये ही ज्ञान का विकास होता है। मनुष्य जो जानता है उस जानकारी को व्यवस्थित और संस्थाबद्ध कर विज्ञान का स्वरूप देता है, और जो चीज़ें उसके ज्ञान के दायरे से उस समय बाहर होती हैं, अज्ञात होती हैं, उन्हें ही कुछ लोग अज्ञात से अज्ञेय बना देते हैं। इसी अज्ञान और आभासी अज्ञेयता में मनुष्य की अतार्किकता को सांस लेने की जगह मिलती है। इसी आभासी अज्ञेयता का इस्तेमाल कभी सर्वखण्डनवाद, संशयवाद, अज्ञेयवाद, ईश्वरवाद तो कभी सामाजिक विज्ञान के दायरे में उत्तर-आधुनिकतावाद को जीवन देने के लिए किया जाता है। माख, एडिंगटन, हाइजनबर्ग, ससकिन्ड, विटन आदि द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्तों की विशिष्ट व्याख्याएँ कहीं न कहीं भगवान के लिए जगह बनाती ही है या फिर यथार्थ के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर देती हैं।
पिछले 100 सालों के भौतिकी के विकास के लिए हम लेनिन के निम्न शब्द उद्धरित कर सकते हैंः
‘‘विज्ञान तथा मुख्यतः भौतिकी में कला की तरह कई धड़े मौजूद हैं जिनके परिणाम एक दूसरे से भिन्न हैं तथा कभी-कभी बिल्कुल उलट तथा विरोधी भी होते हैं।’’ (अनुभवसिद्ध आलोचना और भौतिकवाद) यह प्रवृत्ति खास तौर से 1930 से ज्यादा उभर कर सामने आई। 1900 के दौरान रेडियोएक्टिविटी, विद्युत, चुम्बकत्व आदि की खोजों ने पदार्थ जगत के सूक्ष्मतम तथा नए गुणों को उजागर किया। हर नए प्रयोग व हर नयी खोज के साथ पदार्थ जगत की नयी गतियाँ व रूप सामने आते हैं। विज्ञान के विकास में कभी ऐसा दौर नहीं होता जब विज्ञान सबकुछ जानने का दावा करे। धर्म सभी प्रश्नों का उत्तर देने का वायदा करता है क्योंकि वह कभी सही प्रश्न पूछता ही नहीं। विज्ञान कभी सभी प्रश्नों का उत्तर देने का वायदा नहीं करता, क्योंकि वह सही प्रश्न पूछता है। कोई भी ऐसा क्षण जब विज्ञान हर उपस्थित वैध प्रश्न का उत्तर दे देगा, विज्ञान की मृत्यु का क्षण होगा। विज्ञान की प्रेरक शक्ति ही अज्ञात का वह क्षितिज होता है, जिसे वह ज्ञात बनाता चलता है; लेकिन जब तक कोई अज्ञात क्षितिज ज्ञात बनता है तब तक अज्ञात का एक नया क्षितिज पैदा हो चुका होता है। विज्ञान की गति भी वैज्ञानिक तौर पर ही समझी जा सकती है। इस प्रकार द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया में ही विज्ञान विकसित होता है। विज्ञान के भीतर प्रत्यक्षवादी/नियतत्ववादी धारा और अज्ञेयवादी धारा के बीच हमेशा ही टकराव रहता है। पहली धारा का मानना होता है कि विज्ञान के पास हर प्रश्न का उत्तर है और हर चीज़ को निर्धारित किया जा सकता है, जबकि अज्ञेयवादी धारा दूसरी छोर पर जाकर यह दावा करती है कि पदार्थ जगत को ठीक-ठीक समझा ही नहीं जा सकता, और कुछ धुर अज्ञेयवादी इस बात को यहाँ तक बढ़ा ले जाते हैं कि चूँकि पदार्थ की गति और प्रकृति के बारे में दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता है, इसलिए उसके अस्तित्व के बारे में भी दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता है। पदार्थ और यथार्थ के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया जाता है। इसका कारण होता है द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी नज़रिये का अभाव। इसके कारण वैज्ञानिक अपने विचारधारात्मक पूर्वाग्रहों के साथ प्रयोगशाला में जाते हैं और बाहर निकलते-निकलते या तो वे प्रत्यक्षवादी और नियतत्ववादी बन चुके होते हैं या फिर अज्ञेयवादी! जैसा कि जापानी माक्र्सवादी भौतिकशास्त्री सकाता ने कहा था, एक वैज्ञानिक को पहले से (एप्रायोरी) द्वन्द्वात्मक होना चाहिए, वरना उसकी नियति नियतत्ववाद या अज्ञेयवाद है। कितना सच है।
बहरहाल, हुआ यह कि सूक्ष्म जगत के अनावरण और नये सिद्धान्तों के आने के साथ द्वन्द्ववात्मक भौतिकवादी नजरिये के अभाव में प्रत्यक्षवाद, माखवाद, नवकान्टवाद, भाववाद आदि दार्शनिक धाराओं में पोषित वैज्ञानिक पदार्थ जगत के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े करने लगे। पदार्थ को हटाकर गणित के जटिल समीकरणों व प्रतीकों को ही पूरी भौतिकी मान लेने की धारा बह चली। क्वांटम जगत के खोजे जाने के बाद कई पुरानी गुत्थियाँ तो सुलझ गयीं, परन्तु वही संकट भी पैदा हुआ, जिसका हमने अभी-अभी जि़क्र किया था। वैज्ञानिक दो खेमों में बँट गयेः नियतत्ववाद, जिसकी नुमान्दगी आइंस्टीन, श्रोडिंगर, आदि कर रहे थे और दूसरा अज्ञेयवाद, जिसकी नुमाइन्दगी बोर के नेतृत्व में कोपेनहेगेन स्कूल कर रहा था।
क्वांटम जगत का यानी सूक्ष्म पदार्थ जगत के नए गुणों का सार रखा गया तो नवकाण्टवाद (अज्ञेयवाद) का झंडा लिए हुए कोपनहेगन स्कूल ने विश्व को अज्ञेय करार दे दिया। भौतिकवाद के लिए फिर खतरा घोषित कर दिया गया। इस स्कूल का विरोध करते हुए आईंस्टीन, प्लांक आदि वस्तुतः नियतत्ववाद की ही रक्षा करने में लगे रहे और इसके लिए इन्होंने क्वाण्टम भौतिकी तथा अनिश्चितता के सिद्धांत को नकारने में पुरज़ोर शक्ति लगा दी। इस बहस में नियतत्ववादी धारा पर अज्ञेयवादी धारा अन्ततः हावी रही। इसका कारण स्पष्ट है। अज्ञेयवादी कभी चीज़ों को निर्धारण योग्य नहीं मानता और इसलिए वह कभी निर्धारण करने का दावा भी नहीं करता। नियतत्ववादी का नियतत्ववाद तभी सही माना जायेगा जब वह हर मामले में सफलतापूर्वक निर्धारण कर ले जाये। अगर दस मुद्दे एजेण्डे पर हैं, जिनमें से 9 को निर्धारित करने में नियतत्ववादी सफल हो गये, और एक को वे नहीं निर्धारित कर पाये, तो भी विजय अज्ञेयवादी खेमे की हो जायेगी, क्योंकि निर्धारित करने का बोझ उनके कन्धों पर नहीं होता। लेकिन यह भी सच है कि यह दोनों ही छोर यांत्रिक, अधिभूतवादी और एकांगी हैं। यह पदार्थ जगत की एक द्वन्द्वात्मक समझ विकसित नहीं कर सकते। लेकिन इन दो गैर-द्वन्द्वात्मक छोरों के अतिरिक्त एक तीसरा धड़ा भी था जिसने इन नयी खोजों और सिद्धान्तों की रोशनी में विश्व की द्वन्द्वात्मक समझदारी और सैद्धान्तिक भौतिकी की सही समझदारी विकसित करने का प्रयास किया। यह धड़ा था जापानी माक्र्सवादी वैज्ञानिकों का। महान जापानी भौतिकशास्त्रियों युकावा, ताकेतानी और सकाता ने द्वन्द्वात्मक शैली से लैस होकर क्वांटम जगत के नियमों की भौतिकवादी व्याख्या की। उन्होंने स्पष्ट किया कि नियतत्ववाद और अज्ञेयवाद विश्व की दो विपरीत गैर-द्वन्द्वात्मक समझदारियाँ हैं और इन विपरीत सिद्धान्तों में एक एकरूपता है। इन दोनों का स्रोत एक ही हैः अज्ञात की मौजूदगी। एक अज्ञात के समझ आत्मसमर्पण और उसे अज्ञेय का दजऱ्ा देने का छोर है (अज्ञेयवाद), और दूसरा, अज्ञात के खि़लाफ़ एक नियतत्ववादी प्रतिक्रिया। और ये दोनों ही ग़लत हैं; ये विज्ञान और उसके विकास की प्रक्रिया और इसीलिए पूरे विश्व के विकास की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया और अन्तरविरोध के सिद्धान्त को नहीं समझते। आइये देखें कि इन दो यांत्रिक और अधिभूतवादी छोरों तथा इनके मिश्रण ने विज्ञान में बार-बार आभासी संकट को कैसे जन्म दिया है।



2. आधुनिक भौतिकी में संकट

संकट का इतिहासः नियतत्ववाद बनाम अज्ञेयवाद और द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी हस्तक्षेप
20वीं शताब्दी की शुरुआत से ही भौतिकी के ‘संकट’ की शुरूआत हो चुकी थी। औद्योगिक क्रान्ति ने विज्ञान व तकनीक दोनों को मज़बूती से बुर्जुआ वर्ग के हाथों में पहुँचा दिया। अब बड़े स्तर पर प्रयोग होने लगे। पूंजीपतियों की सरकारों ने और खुद पूंजीपतियों ने वैज्ञानिक शोध को खड़ा किया जिससे की उत्पादक शक्तियों को और मजबूत बनाकर मजदूर वर्ग के श्रम के शोषण को और साथ ही अधिशेष विनियोजन को और अधिक कुशल बनाया जा सके। 20वीं शताब्दी के शुरुआत तक जमा हो रहे आँकड़े क्लासिकल न्यूटोनियन भौतिकी पर सवाल खड़े कर रहे थे। उस समय प्रचलित ईथर सिद्धान्त पर सवाल खड़े हो रहे थे। यह भी खोज निकाला गया था कि अणु अविभाज्य नहीं है और वह स्वयं भी दूसरे और अधिक सूक्ष्म कणों से मिलकर बना हैं। गैलवैनीय विद्युत, ऊष्मा के प्रयोग आदि भी पदार्थ जगत के नये गुणों को उद्घाटित कर रहे थे। ग़ौरतलब है कि हर नये प्रयोग के बाद माख, पाॅइनकेयर आदि जैसे वैज्ञानिक शोर-गुल मचाते हुए भौतिकवाद को गुप्त तरह से या खुले तौर पर नकार कर रहे थे। इसी समय आइन्सटीन ने जमा आँकड़ों को सुस्पष्ट सिद्धांत में समेटकर ईथर को विज्ञान जगत से बाहर का रास्ता दिखाया। यानी इस विश्व में पदार्थ जगत के बीच ऊर्जा के हस्तानांतरण के लिये ईथर के माध्यम की कल्पना की जरूरत नहीं रह गयी। ऊर्जा खुद पदार्थ का एक रूप होती है, यह बात सत्यापित हो गयी। लेनिन ने जब ‘भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना’ लिखी थी, तब ओस्टवाल्ड के ऊर्जा सिद्धान्त की आलोचना करते हुए इस बात पर मुख्य जोर दिया था। लेनिन ने यह सिद्ध किया था कि यह भौतिकी का संकट नहीं था बल्कि विज्ञान की अधिभूतवादी, नियतत्तववादी, निरपेक्ष एवं एकंागी समझ के वैज्ञानिकांे पर हावी होने से पैदा हुआ ‘संकट’ था। वास्तव में तो हर नया प्रयोग पदार्थ के द्वन्द्वात्मक विकास को पुष्ट कर रहा था। 1919 तक आईन्सटीन ने नये आंकड़ों के अनुरूप आधुनिक विज्ञान का प्रमुख सिद्धान्त प्रतिपादित किया, यानी सामान्य सापेक्षिकता का सिद्धान्त (General Theory of Relativity) प्रतिपादित किया। यह सिद्धांत निरपेक्ष प्रेक्षण की अवधारणा को नकार देता है। हर प्रेक्षक समतुल्य होता है। मतलब यह कि किसी भी विशिष्ट प्रेक्षक, जैसे इथर या भगवान को किसी प्रेक्षक पर कोइ तरजीह नहीं प्राप्त होती है। हर प्रेक्षण साकपेक्षिक होता है। यह सिद्धांत ब्रह्माण्ड की ज्यामिति तथा पदार्थ की गति को सू़त्रीकृत करता है तथा इसने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को और अधिक गहरे धरातल पर पुष्ट किया।

20वीं शताब्दी में सूक्ष्म जगत की खोज और फिर प्लांक तथा आईन्स्टीन के ब्लैक बॉडी विकिरण, फोटोलेक्ट्रिक प्रभाव आदि समेत सूक्ष्म जगत की गति से जुड़े विभिन्न सिद्धान्तों के आने के साथ ही क्लासिकीय भौतिकी की ख़ामियाँ सामने आने लगीं। 1925 में हाईजेनबर्ग ने अपने अनिश्चितता के सिद्धंात को भी सूत्रबद्ध किया। पदार्थ जगत में सूक्ष्म स्तर पर जाने पर पदार्थ के गुणों में विशिष्ट बदलाव आते हैं। यह पाया गया की इलेक्ट्राॅन करीबन 300,00,000 मीटर प्रति सेकण्ड की गति से नाभिक के चारों और चक्कर काटते हैं। यह जाना गया कि इलेक्ट्राॅन सिर्फ कण न रहकर तरंग तथा कण के परस्पर अन्तर्गुंथित (इण्टरट्वाइण्ड) रूप में मौजूद रहता है। इस सिद्धांत ने तब तक मौजूद सिद्धान्तों (न्यूटोनीयन भौतिकी) के आधार को हिला दिया। पदार्थ का दोहरा चरित्र होता है। यानी वह एक साथ कण भी है और तरंग भी! यह बात आम समझ से परे लगती है। लेकिन सूक्ष्म जगत में ऐसा ही होता है।
बोर और हाईजे़नबर्ग की अगुवाई में कोपेनहेगन स्कूल ने प्रेक्षण की सीमा के कारण सूक्ष्म कणों की गति और पथ में पैदा होने वाली अनिश्चितता के आधार पर इस विश्व को ही अबूझ करार दे दिया। सिर्फ समीकरणों और प्रतीकों को भौतिकी मानने वाले वैज्ञानिकों में हाहाकार मच गया। भौतिकवाद के लिए यह आभासी संकट भी इसी समय से पैदा किया गया। कोपेनहेगन स्कूल ने अनिष्चितता को प्रकृति का नियम बताते हुए कहा कि पदार्थ जगत के बारे में कोई प्रयोग सटीक नहीं हो सकता है। हाइज़ेनबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धान्त के अनुसार इलेक्ट्राॅन अवस्थिति और वेग का एक साथ-साथ सही-सही आकलन नहीं किया जा सकता क्योंकि प्रेक्षण हेतु जब उस पर प्रकाश डाला जाता है तो प्रकाश के कण चरित्र के कारण इलेक्ट्राॅन की गति और अवस्थिति में परिवर्तन आ जाता है। हाईजे़नबर्ग ने अपने विचारधारात्मक पूर्वाग्रहों से प्रेरित होकर इससे यह नतीजा निकाला कि हम पदार्थ जगत की प्रकृति और चरित्र के बारे में कुछ नहीं कह सकते और इसलिए यथार्थ के अस्तित्व पर भी प्रश्न खड़ा हो जाता है। हाईज़ेनबर्ग का प्रसिद्ध कथन थाः ”प्रेक्षक यथार्थ का निर्माण करता है।“ निश्चित रूप से, यह एक गैर-द्वन्द्वात्मक नतीजा है। इसके बारे में द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी अवस्थिति पर खड़े वैज्ञानिकों ने क्या आलोचना की इस पर हम बाद में आएँगे। लेकिन आइन्सटीन और प्लांक के पक्ष ने इस पक्ष का अधिभूतवादी और नियतत्तववादी ढ़ंग से विरोध किया। ‘‘ईश्वर दाँव नहीं लगाता’’-आइन्सटीन का प्रचलित कथन उनकी दार्षनिक अवस्थिति को दर्षाता है। निश्चित तौर पर यह एक जुमला (रेटरिक) था और इससे उनके ईश्वर में विश्वास से कोई लेना-देना नहीं है। आइन्स्टीन के धर्म और ईश्वर के बारे में विचार अलग से चर्चा का विषय हैं, लेकिन यहाँ इतना बताया जा सकता है कि वह धार्मिक नहीं थे; ईश्वर के बारे में उनके विचार वही थे जो कि बरूच स्पिनोज़ा के थे। स्पिनोज़ा ने प्रकृति और ईश्वर को एक ही माना था। प्रकृति की व्यवस्था और सिमिट्री वास्तव में उन सभी विशिष्टताओं और सापेक्षिकताओं का सामान्यीकृत निरपेक्ष है, जो पदार्थ जगत में मौजूद हैं। ईश्वर के बारे में आइन्स्टीन का मानना था कि इसके बारे में विज्ञान अभी कुछ कहने की हालत में नहीं है, लेकिन फिलहाल के लिए तर्क और विवेक को अपने शुद्धतम और उदात्ततम रूप में प्रकृति में देखा जा सकता है, और उसे ही ईश्वर कहा जा सकता है। स्पष्ट है कि अज्ञेयवाद के प्रति आइन्स्टीन की अतिरंजित प्रतिक्रिया उन्हें इस छोर तक ले गयी थी। प्रकृति में अगर सबकुछ नियतत्ववादी ढंग से व्यवस्थित नहीं है और निश्चितता और अनिश्चितता के सतत द्वन्द्व में ही यथार्थ मौजूद है, जैसा कि सूक्ष्म विश्व की खोज ने दिखलाया, तो फिर अज्ञेयवाद के तर्कों का जवाब दे पाना किसी नियतत्ववादी के लिए मुश्किल हो जाता! इसलिए वे कहीं-कहीं यह कहने की हद तक चले जाते हैं कि प्रकृति में सबकुछ नियतत्ववादी ढंग से व्यवस्थित और सिमिट्रिकल है और उनकी बात से ऐसी गन्ध आने लगती है कि इसके पीछे कोई दिव्य हस्तक्षेप है। यह नियतत्ववाद ही आइंस्टीन के दार्शनिक वैज्ञानिक जीवन की सबसे बड़ी कमी था, और इसी के कारण साॅल्वे सम्मेलन में हुई महान वैज्ञानिक बहसों में उनकी अवस्थिति कोपेनहेगेन स्कूल के समक्ष कमज़ोर पड़ी। हालाँकि बाद में आइंस्टीन ने दो अन्य वैज्ञानिकों पोडोल्स्की और रोज़ेन के साथ मिलकर दिखलाया कि अज्ञेयवाद के अतिरेकपूर्ण दावे किसी रूप में ग़लत हैं। बाद में इन तीनों की परिकल्पना को डेविड बोम और न्यूमैन जैसे वैज्ञानिकों ने सही साबित किया। ये परिकल्पना नियतत्ववाद को तो सही नहीं ठहरा पाती, लेकिन अज्ञेयवाद पर प्राणान्तक चोट करती है। इस पर विस्तार से चर्चा सम्भव नहीं है। अब हम उस तीसरे पक्ष की बात करते हैं जिस पक्ष ने अज्ञेयवाद बनाम नियतत्ववाद की बहस में एक द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी हस्तक्षेप किया।
जापान के ताकेतानी और सकाता ने द्वंद्वात्मक भौतिकवादी अवस्थिति से यह दर्षाया कि क्वाण्टम भौतिकी पूर्णतः पदार्थ जगत के विषिष्ट स्तर को समझाती है। यहाँ सटीकता की बहस ही बेमानी है। न्यूटोनीय भौतिकी वृहद जगत के लिए आज भी सच है। लेकिन प्रेक्षण के धरातल के बदलने के साथ, सन्दर्भ के बदलने के साथ, अलग-अलग जगत में गति के नियमों में भी परिवर्तन आ जाता है। दूसरी बात यह, कि प्रकृति में निश्चितता और अनिश्चितता के बीच, निर्धारण और संयोग के बीच हमेशा एक द्वन्द्व मौजूद रहता है। निश्चित तौर पर यह द्वन्द्व अपने आपको प्रकृति के गति के नियमों की व्याख्या करने वाले विज्ञान में भी अभिव्यक्त करता है। सूक्ष्म जगत में जिन कारणों से आज अनिश्चितता मौजूद है, उसे इन वैज्ञानिकों प्रेक्षण समस्या (आॅब्ज़र्वेशन प्राॅब्लम) का नाम दिया और बताया कि प्रेक्षक और प्रेक्षण के उपकरणों के विकास के साथ इस धरातल पर मौजूद प्रेक्षण की समस्या का समाधान हो जायेगा, लेकिन तब कोई न कोई नया धरातल सामने होगा, जिस पर नये सिरे से अनिश्चितता और प्रेक्षण की समस्या मौजूद होगी। यह प्रक्रिया ही पदार्थ जगत के विकास की द्वन्द्वात्मकता को विज्ञान की द्वन्द्वात्मकता में प्रतिबिम्बित करती है। अब चूँकि विज्ञान में निश्चितता और अनिश्चितता, दोनों के ही पहलू सतत और अनन्त रूप से मौजूद रहे हैं और रहेंगे, इसलिए यदि वैज्ञानिक पहले से ही एक द्वन्द्वात्मक समझ को लेकर प्रस्थान नहीं करता तो वह निश्चित तौर पर या तो आइंस्टीन-श्रोडिंगर के नियतत्ववाद और स्पिनोज़ा के ईश्वर का शिकार बन जायेगा, या फिर, हाइज़ेनबर्ग और बोर के नवकाण्टीय अज्ञेयवाद की खाई में जा गिरेगा, जहाँ उसके लिए होने और न होने का अर्थ ही समाप्त हो जायेगा, क्योंकि समस्त पदार्थ जगत ही है या नहीं, इसकी कोई गारण्टी नहीं है; ऐसा भी हो सकता है कि सब माया हो! सामाजिक विज्ञान की तरह ही प्रकृति विज्ञान में भी एक वैचारिक संघर्ष जारी रहा है। यह संघर्ष 20वीं सदी में अपनी ऊँचाइयों और गहराइयों तक गया। लेकिन महान प्रतिभाएँ भी विज्ञानवादी नियतत्ववाद और विज्ञानवादी अज्ञेयवाद का शिकार हो गयीं। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ने भौतिकी में मौजूद आभासी संकट का जो समाधान किया, उसे बुर्जुआ मीडिया कहीं भी नहीं प्रदर्शित करता और न ही उसे स्कूलों और काॅलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है। लेकिन सकाता, ताकेतानी और युकावा जैसे वैज्ञानिकों के योगदान को समझे बिना आधुनिक भौतिकी की एक सही समझदारी विकसित कर पाना मुश्किल है।

आज की समस्यायें
जिनेवा में हो रहे लार्ज हाइड्राॅन कोलाइडर प्रयोग से पहले तमाम भोंपूओं ने इसके खिलाफ यह प्रचारित करना षुरू किया कि इस प्रयोग से दुनिया तबाह हो जायेगी, भगवान की बनाई दुनिया में छेड़कानी करना खतरनाक होगा। इस प्रयोग में 27 किमी की एक सुरंग में दो प्रोटाॅन (हाईड्राॅन) की आपस में टक्कर होगी। इस ऊर्जा के स्तर पर हमें पदार्थ के विषिष्ट गुण देखने को मिल सकते हैं। कुछ वैज्ञानिक तथा मीडिया में यह अफवाह उठी कि इस प्रयोग से ब्लैक होल पैदा होंगे जो पूरी दुनिया का विनाष कर देंगे। लेकिन तमाम अटकलबाजियों को नकारते हुए यह प्रयोग सफल रहा। कई वज्ञैानिक इसे स्ट्रिंग थ्यरी को पुख्ता करने का माध्यम मानते हैं। कुछ अतिरिक्त आयाम ढूंढना चाहते हैं तो कुछ भगवान के हाथ! पिछले 35 सालों से वैज्ञानिक हर सवाल का जवाब देने वाले एक सिद्धान्त (थियरी फाॅर एवरीथिंग) की तलाश में हैं जिसकी सबसे बड़ी दावेदार स्ट्रिंग थियरी है। भौतिक वैज्ञानिकों की पूरी एक उम्र, करीबन 35 साल, खर्च होने, दर्जनों स्ट्रिंग थियरी सम्मेलनों, सैकड़ों शोध कार्यों और हजारों पेपरों के लिखे जाने के बावजूद अभी तक ऐसे किसी सिद्धान्त को सिद्ध करने वाला कोई प्रयोग नहीं है। करीब 20 साल पहले ही विलक्षण अमेरिकी वैज्ञानिक रिचर्ड फाइनमैन ने इसे नकारा था, ग्लाशाओ (नोबल पुरस्कार विजेता) ने इसे मध्ययुगीन धर्मशास्त्र जैसा कहा था।

1960 से लेकर ब्रह्माण्ड के स्तर तथा सूक्ष्मतर स्तर दोनों ही जगह लगातार नयी खोजें, नयी परिघटनाएं सामने आती रही हैं जैसे कि पल्सर, ब्लैक होल, बैकग्राउन्ड रेडिएशन, मेसोन इत्यादी। आज आधुनिक भौतिकी में वैज्ञानिकों के पास कई समीकरण मौजूद हैं, अलग अलग वैज्ञानिकों के पास खुद कई ब्रहमाण्ड की लम्बी सूची है। बस समीकरण में एक फेर-बदल कीजिए और आप नए ब्रहमाण की खोज कर सकते हैं! स्टैण्डर्ड माॅडल अब तक कण भौतिकी का सबसे कामयाब सिद्धान्त है तथा इसी के आधार पर प्रसिद्ध सर्न की प्रयोगशाला में एल.एच.सी. प्रयोग हो रहा है, पर यह भी आज मौजूद सारे सवालों का जवाब नहीं देती है।

स्टैण्डर्ड माॅडल
स्टैन्डर्ड माॅडल कण भौतिकी का वह सिद्धांत है जो चार बुनियादी बलों में से तीन को एक सामान्यीकृत सिद्धांत द्वारा अभिव्यक्त करता है। इस माॅडल के अनुसार प्रकृति में 16 बुनियादी कण हैं जिन्हें दो वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है- फर्मिआॅन तथा बुसाॅन। फर्मिआॅन पदार्थ के बुनियादी संघटक कण है। स्टैन्डर्ड माॅडल में 12 फर्मिआॅन हैं। बुसाॅन इन फर्मिआॅन्स के बीच विनिमय होने वाले कण है और इन्हीं कि वजह से बुनियादी अन्तव्र्यहार (पदजमतंबजपवद) उत्पन्न होते हैं। स्टैन्डर्ड माॅडल में 4 बुसाॅन है जो 3 प्रकार के बुनियादी अन्तव्र्यवहार - विद्युत चुम्बकत्व, शक्तिषाली अन्तव्र्यवहार और कमजोर अन्तव्र्यवहार को जन्म देती है। इसके साथ ही यह माॅडल एक अन्य बुसाॅन, हिग्स बुसाॅन की भी परिकल्पना करता है जो बुनियादी कणों को एक विषेष मैकेनिज्म-हिग्स मैकेनिज्म-द्वारा द्रव्यमान देता है। परन्तु यह ब्रह्माण्ड के चैथे बुनियादी बल, गुरुत्व को व्याख्यायित नहीं करता है। साथ ही यह ब्रह्माण्ड में डार्क मैटर के अस्तित्व को भी नहीं समझाता है।



स्ट्रिंग थियरी
स्ट्रिंग थियरी ‘थियरी फॅार एवरीथिंग’ बनने की प्रमुख दावेदार है। यह सापेक्षिकता सिद्धान्त और क्वांटम सिद्धान्त को एकीकृत करती है। इसके सामने लक्ष्य था आकाषगंगाओं, सौर मंडल, ब्लैक होल आदि की संरचना (जिसकी व्याख्या सापेक्षिता का सामान्य सिद्धान्त करता है) तथा माइक्रोस्कोपिक संरचनाओं में मौजूद अनिश्चितता (जो कि क्वाण्टम भौतिकी द्वारा ज्ञात होती है) को एक समीकरण में बैठाना। यह बिगबैंग से मौजूदा ब्रह्मण्ड के विकास क्रम की व्याख्या करती है। स्टैण्डर्ड माॅडल की कमियों से आगे बढ़ते हुए यह चारों बुनियादी बलों को एकीकृत करती है। साथ ही यह डार्क मैटर के अस्तित्व को भी समझाती है। परन्तु यह सब सिर्फ भौतिकी की किताबों तक ही सीमित है और अभी तक प्रायोगिक स्तर पर इसके पक्ष में पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। पिछले 35 सालों मंे वैज्ञानिकों द्वारा की गयी माथापच्ची के बावजूद भी स्ट्रिंग थ्यरी महज परिकल्पना के स्तर तक ही सीमित रह पायी है और आगे बढ़कर अभिधारणा में रूपान्तरित नहीं हो सकी है। ताकेतानी ने विज्ञान तथा समाज में मानवीय ज्ञान की अवधारणा को व्याख्यायित करते हुए कहा था कि सबसे पहले प्रकृति तथा समाज में जब कोई परिघटना उपस्थित होती है तो हम इसे स्वीकार करते हैं। इसके बाद वस्तुपरक तरीके के उस परिघटना को सांगोपांग समझने का प्रयास किया जाता है, उस परिघटना में मौजूद तत्वों तथा संघटक अवयवों को समझते हैं। तीसरी मंजिल पर हम धरातल पर मौजूद लक्षणों को भेदकर उसकी अंतर्वस्तु तक प्रवेश करते हैं। समग्रता में समझकर हम परिघटना के समाधान की ओर बढ़ते हैं। समाधान की ओर अग्रसर होते हुए परिकल्पना अभिधारणा तक विकसित होती है। इसके बाद वैज्ञानिक प्रयोगों में यह अभिधारणा सत्यापित होती है। परन्तु स्ट्रिंग थियरी तीन मंजिलों के क्रम से नहीं गुजरती है। यह पिछले ३५ सालों से ब्रह्माण्ड कि परिघटनाओं को महज परिकल्पनात्मक रूप से समझाती है परन्तु प्रयोग के धरातल पर खुद को सत्यापित नहीं करती है। कुछ साल पहले तक स्ट्रिंग थियरी के कईं संस्करण प्रचलित थे। (यह संख्या 1000 से भी अधिक थी!!!) 1984 तक ये मुख्यतः पाँच स्टिंªग थ्योरियों तक पहुँचा। आज विटेन की एम-थियरी को एकमात्र दावेदार माना जाता है। विटेन के अनुसार ‘एम-थियरी’ में ‘एम’ को लोग अपनी इच्छा पर अनुसार इसे जादू, मिथक या रहस्य कह सकते हैं। यह विज्ञान नहीं है। खैर विटेन की इस अवस्थिति से कई ईश्वरपरक, दार्शनिक खुश हुए होंगे।
स्ट्रिंग थियरी पदार्थ कणों की जगह ‘‘स्ट्रिंग्स’’ को ही पदार्थ जगत का सबसे मूलभूत संरचनात्मक अवयव मानती है। फ़ोटाॅन्स से लेकर बुसाॅन्स तक सभी इन स्ट्रिंगों से ही बने होते हैं। यह ऐसा ही है जैसे गिटार के तारों की झनकार से विभिन्न प्रकार के सुर पैदा होते हैं। अलग अलग सुर पदार्थ के मूलभूत कणों के समान हैं जैसे बुसाॅन तथा फर्मिआॅन। पदार्थ जगत की विभिन्न परिघटनाएं भी स्ट्रिंग के कम्पनों द्वारा पैदा होती हैं। स्ट्रिंग थियरी दिक के ३ आयामों को हटाकर १० से ११ आयामों की मौजदगी की बात करती है। स्ट्रिंग के कुछ कम्पन्न को ही मनुष्य अपने अपने ३ आयमी ब्रह्माण्ड में सीमित प्रेक्षण के कारण प्रेक्षित कर पाते हैं बाकी के कम्पन्न उन ६ या ७ आयाम पर असर करते हैं, जो की हमारी संवेदना से बाहर है! पर हमारी संवेदना से परे यह कल्पना जगत विज्ञान का हिस्सा नहीं बन सकता है. ऐसा ‘‘मेट्रिक्स‘‘ व ‘‘स्टार वार्स‘‘ जैसी फिल्मों में ही हो सकता है. खैर अगर इस थिअरी के द्वारा पेश किये गए अनुमानों पर भी नजर डाले तो साफ हो जाता है कि यह कितनी व्यावहारिक है।
स्ट्रिंग थियरी के अनुसार ब्रह्माण्ड में सुपरसिमैट्री की मौजूदगी है परन्तु यह अभी तक किसी प्रयोग में साबित नहीं हुयी है। और अगर ब्म्त्छ में हुये प्रयोग से सुपरसिमैट्री साबित नहीं होती तो भी यह स्ट्रिंग थियरी का निषेध नहीं होगी। कारण साफ है स्ट्रिंग थियरी अभी तक व्यावहारिक नहीं है। यह भौतिक तथ्यों से ज्यादा अमूर्त संकेतों तथा विचारों के ढ़ाँचे से बनी इमारत है जिसे वैज्ञानिकों की पूरी पीढ़ी ने तार्किक जोड़-घटाव, उच्चतर गणित के समीकरणों से बनाया है। संकेत तथा समीकरण महज हमारे वस्तुगत जगत के बोध (जो गलत भी हो सकता है) को दिखाते हैं। पदार्थ प्राथमिक होता है। परन्तु कुछ वैज्ञानिक इन संकेतों व समीकरणों को ही प्राथमिक मानते हैं। ‘‘पदार्थ गायब हो जाता है, जो बचता है वह है समीकरण‘‘ (लेनिन, अनुभवसिद्ध आलोचना और भौतिकवाद )। ब्रह्माण्ड को इस समीकरण के अनुसार व्यवहार करना होता है। इसके परिणाम यह होते हैं कि ब्रह्मण्ड तीन आयामी से बढ़ कर कई आयामी हो जाता है। यहाँ तक कि एक ब्रह्मण्ड की जगह अब कई ब्रह्मण्ड परिकल्पित किए जाते हैं।

एक और बात, यह सिद्धांत ‘थियरी फाॅर एव्रीथिंग’ का मुख्य दावेदार है। थियरी फाॅर एव्रीथिंग होने का मतलब यह है कि यह थियरी सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड में हो रहे किसी भी प्रयोग के परिणाम की पूर्वघोषणा करती है। यह भौतिकी की आखिरी थियरी होगी। यह भाववाद ही है और कुछ नहीं। विज्ञान का कोई भी सिद्धांत आखिरी नहीं हो सकता है। हमारे ज्ञान कि अवधारणा विकासशील है तथा विज्ञान भी विकासशील है। आखिरी सिद्धांत इश्वरपरक, भाववादी विचारक ही सोच सकते हैं।

3. भौतिकवाद को खतरा?
जैसा कि हमने पहले भी कहा, विज्ञान में जब-जब गुणात्मक छलांगें लगती हैं तो वैज्ञानिकों का एक हिस्सा है जो ”संकट आया-संकट आया“ का शोर मचाता है और फ्रांसीसी दार्शनिक लुई अल्थूसर के शब्दों में ”दार्शनिक धंधे में लग जाता है।“ जब माखवाद ने सिर उठाया था तो लेनिन ने इसका दार्षनिक आधार पेश किया व इसका पूर्ण खण्डन किया। उन्होंने यह दिखाया कि मौजूदा आभासी संकट वैज्ञानिकों के गलत विश्व दृष्टिकोण, अप्रोच और पद्धति के कारण पैदा हुआ था। जैसा कि लेनिन ने दिखलाया तब भी असल में भौतिकवाद के लिए कोई संकट नहीं था और आज भी भौतिकवाद के लिए कोई संकट नहीं है। मानव प्रेक्षण का धरातल गहराने के साथ नयी वास्तविकताएँ सामने आती हैं; नयी वास्तविकताओं का विश्लेषण करने में जो समय लगता है, उस समय में आम तौर पर मानव प्रेक्षण का धरातल और गहरा जाता है और फिर से नयी वास्तविकताएँ उपस्थित हो जाती हैं। और उपस्थित वास्तविकताओं के विश्लेषण की प्रक्रिया होती ही ऐसी है कि वह मानव प्रेक्षण को और सूक्ष्मतर धरातलों पर ले जाये। इसलिए हर नयी और बड़ी खोज के बाद, गैर-द्वन्द्वात्मक ज़मीन पर खड़े वैज्ञानिक या तो नियतत्ववादी अवस्थिति से नयी अव्याख्यायित और अविश्लेषित परिघटनाओं की मौजूदगी से ही इंकार कर देते हैं, या फिर अज्ञेयवादी वैज्ञानिक विश्व को मानव समझ के परे बताते हुए नवकाण्टवाद के गड्ढे में गिर जाते हैं।

अनिश्चितता से खतरा
हाईज़ेनबर्ग ने अनिश्चितता को आधार बनाकर सम्पूर्ण विश्व को अबूझ करार दे दिया था। चूँकि इलेक्ट्राॅन की गति और अवस्थिति को एक साथ सटीकता के साथ मापा नहीं जा सकता इसलिए यह जाना ही नहीं जा सकता कि अपने आपमें इलेक्ट्राॅन बला क्या है! और इसलिए वास्तव में यही नहीं जाना जा सकता कि पदार्थ बला क्या है! पदार्थ है, लेकिन क्या है यह कोई नहीं बता सकता। ऐसे में प्रेक्षक यथार्थ का निर्माण करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यथार्थ एक निर्मिति है। हाइज़ेनबर्ग द्वारा ‘अनिश्चितता के सिद्धान्त’ की इस नवकाण्टीय व्याख्या ने सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति दजऱ् करायी। सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में उत्तरआधुनिकतावाद को इस सिद्धान्त से काफी बल मिला। हाइज़ेनबर्ग द्वारा सूक्ष्म जगत में मौजूद अनिश्चितता के पहलू का यह नवकाण्टीय सामान्यीकरण भौतिकी के कार्य-कारण सम्बन्ध (काॅज़ैलिटी) सिद्धांत को नकार देता है। इस दर्शन के विचारक यह तर्क देते हैं कि अगर किसी प्रयोग में 10 पे्रक्षण में से एक बार भी हमारी अवधारणा के विपरीत परिणाम आता है तो इसका मतलब यह है कि हम उस परिघटना के विषय में नहीं जान सकते हैं तथा यह कार्य-कारण सिद्धांत का निषेध होता है। लेकिन वास्तव में यहाँ यह प्रयोग कार्य-कारण सिद्धांत को दो तरह से सिद्ध करता है। 10 पे्रक्षण मंे से 9 बार हमारी पूर्वकल्पना के अनुसार परिणाम आते हैं और 1 बार विपरीत परिणाम आता है तो हमें उन अज्ञात कारणांे की तलाष करने का मौका मिलता है जिनके कारण हमारी प्रस्थापना चिन्हित नहीं हो पाई।
इसके अलावा, क्वाण्टम भौतिकी में अनिश्चितता भी हमारे प्रेक्षण पर निर्भर करती है। यहाँ अनिश्चितता हमारे प्रेक्षण के उपकरणों की सीमा के कारण उत्पन्न होती है। प्रेक्षणों के और अधिक उन्नत और गहरे होने के साथ अनिष्चितता, फिर से निश्चितता तथा अनिश्चितता में टूट जाती है। नई निश्चितता पुरानी निश्चितता से ज्यादा उन्नत होगी और नई अनिश्चितता पुरानी अनिश्चितता से अधिक उन्नत होगी। विज्ञान न सिर्फ उन्नत निश्चितताओं का स्वागत करता है, बल्कि उन्नत अनिश्चितताओं का भी स्वागत करता है, क्योंकि अनिश्चितता ही निश्चितता में बदल सकती है। निश्चितता तो पहले से ही निश्चितता है। इसलिए उन्नत निश्चितताओं के जन्म के लिए अनिश्चितताओं का होना ज़रूरी है। यही द्वंद्वात्मक भौतिकवादी नजरिया है और वास्तव में हाइजे़नबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धान्त द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी दृष्टिकोण को सिद्ध करता है, जो हमेशा से नियतत्ववाद और प्रत्यक्षवाद के विरुद्ध संघर्ष करता रहा है। कोम्ते की माक्र्सवादी आलोचना वास्तव में प्रत्यक्षवाद की ही आलोचना थी। दार्शनिक तौर पर, माक्र्सवाद प्रत्यक्षवाद के खि़लाफ है जो एक बुर्जुआ विचारधारा है और आधुनिक बुर्जुआ समाजशास्त्र का आधार है।

‘गाॅड पार्टिकल’ से खतरा
दरअसल यह कोई खतरा नहीं है, बुर्जुआ मीडिया द्वारा मचाया गया शोर है। हिग्स बुसाॅन कण भौतिकी के सफलतम सिद्धान्त स्टैंडर्ड माॅडल द्वारा प्रतिपादित मूलभूत कणों में से एक है। अगर यह सच है कि बिग बैंग के दौरान हिग्स फील्ड द्वारा हिग्स बुसान बना था तो यह स्टैंडर्ड माॅडल को साबित करेगा। अगर सर्न के प्रयोग में यह साबित हो जाता है तो इसका अर्थ होगा कि पदार्थ कभी बना था, यानी उसका भी जन्म हुआ था। कई भौतिकवादी इस हिग्स बुसाॅन के मिलने की क्षीण सम्भावना से भी डरे हुए हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर यह साबित हो गया कि पदार्थ कभी बना था, तो भौतिकवाद का क्या होगा? वे यह नहीं समझते हैं कि पदार्थ के पैदा होने या नहीं होने से भौतिकवाद की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। पदार्थ पैदा हुआ या नहीं हुआ, यह सवाल भौतिकवाद पूछता ही नहीं है, इसलिए उससे इसके उत्तर की उम्मीद करना बेमानी होगा। भौतिकवाद यह ज़रूर कहता है कि चेतना पदार्थ को जन्म नहीं देती। यह कोई समय था जब कोई द्रव्यमान युक्त पदार्थ नहीं था, और सिर्फ एक फील्ड थी, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि उससे पहले कोई ‘परम चेतना’ (ईश्वर) था, जिसने पदार्थ को जन्म दिया! यह एक मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव होगा। दूसरी बात यह कि भौतिकवाद यदि किसी चीज़ पर निर्भर करता है तो वह भौतिक यथार्थ है, पदार्थ नहीं। फील्ड स्वयं भी एक भौतिक यथार्थ है; वह ईश्वर या दैवीय हस्तक्षेप नहीं है।
अगर हिग्स बुसाॅन मिलता भी है, जिसकी सम्भावना स्वयं सर्न प्रयोग के वैज्ञानिकों के अनुसार नगण्य है, तो भी यह भौतिकवाद के लिए कोई खतरा नहीं होगा। यह पदार्थ जगत और पदार्थ के नये गुणों की खोज होगा और पदार्थ के इतिहास की खोज होगा। इससे भौतिकवाद के इस मूल तर्क पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि चेतना पदार्थ के पहले नहीं बाद में आती है और चेतना पदार्थ से स्वतन्त्र अस्तित्व में नहीं रह सकती बल्कि वह पदार्थ के ही एक विशिष्ट रूप के उन्नततम किस्म का गुण है। यानी, चेतना जैविक पदार्थ के उन्नततम रूप, मनुष्य का गुण है। अगर हिग्स बुसाॅन मिलता है तो भी यह सत्य अपनी जगह कायम रहेगा। कोई फील्ड को ईश्वर का नाम दे देता है तो यह उस नाम देने वाले और एक हद तक फील्ड की बदनसीबी होगी, भौतिकवाद की नहीं! भौतिकवाद ने अपने एजेण्डे पर कभी यह सवाल रखा ही नहीं कि पदार्थ पैदा हुआ था या नहीं। यह भौतिकवाद की विषयवस्तु नहीं है। यह प्राकृतिक विज्ञान की विषय वस्तु है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद प्राकृतिक विज्ञान के इस प्रश्न का जवाब देने के लिए वैज्ञानिकों को एक सही अप्रोच और पद्धति दे सकता है। लेकिन अपने आप में इस सवाल का जवाब देना भौतिकवाद का एजेण्डा ही नहीं है। उसका एजेण्डा भाववाद से संघर्ष की प्रक्रिया में पैदा हुआ और वह सिर्फ इतना ही दावा करता है कि चेतना पदार्थ में ही निवास कर सकती है, उससे बाहर निर्वात में नहीं। पदार्थ का किसी मौके पर जन्म हुआ हो और उसके पहले एक निर्वात की स्थिति रही हो तो इससे यह साबित नहीं होता है कि चेतना पहले आई। इसका कारण बस इतना है कि निर्वात निर्वात होता है और चेतना चेतना!!! चेतना निर्वात नहीं होती और निर्वात चेतना नहीं होता!!! बल्कि कहा यह जाना चाहिए कि द्रव्यमान रखने वाला पदार्थ ही समस्त भौतिक जगत नहीं है, वह भौतिक जगत का एक अंग है। निर्वात भी एक भौतिक वास्तविकता है, यह कोई मायाजगत नहीं है जिसमें ईश्वर अपनी लीला खेल रहा हो! इसलिए भौतिकवाद को यह कहना कि ”देखो, देखो!! पदार्थ पैदा हुआ था! अब बोलो!?“ यदि हिग्स बूसाॅन मिलता है तो बस इतना ही साबित होगा कि भौतिक विश्व का एक नया पहलू था जो अब तक उद्घाटित नहीं हुआ था। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इसकी व्याख्या, विस्तार और अन्य क्षेत्रों में इसके डेरिवेशन से और अधिक उन्नत होगा।

हिडेन डायमेंशन/नये “ब्रह्मण्डों“ से प्रतिस्पर्धा से खतरा
स्ट्रिंग थिअरी की एक धारणा यह भी है कि इस विश्व में भौतिक जगत में तीन से ज़्यादा आयाम होते हैं (फिलहाल हम सिर्फ दिक् की बात कर रहे हैं काल की नहीं) जो कि 6 से 7 तक हो सकते हैं या कि हमारा ब्रह्माण्ड इस समय मौजूद कई ब्रह्माण्डों में से एक है। दरअसल यह अवधारणा किसी भौतिक आँकड़े या वैज्ञानिक आगमनात्मक शैली से ज्यादा तार्किक कल्पनाओं के आधार पर खड़ी है। कोई विचार कितना भी तार्किक या द्वन्द्ववादी हो भौतिक विश्व ही उसका आधार होता है। परन्तु पिछले पैंतिस सालों से कोई भी प्रयोग या आँकड़ा स्पष्टतः इसे साबित नहीं कर पाया है, परन्तु नकार भी नहीं पाया है। एक समय ऐसा था कि कई स्ट्रिंग थियरी मौजूद थीं, और हर थियरी ब्रह्माण्ड की कल्पना अपने हिसाब से करती थी। भाववाद के बारे में लेनिन का कथन वैज्ञानिकों की अवस्थिति को स्पष्ट करता है।
‘‘भाववाद के हजारों प्रकार के हजारों रूप हो सकते है और हमेशा ही एक हजार एक नए रूप निर्मित किए जा सकते हैं.........भौतिकवाद के नजरिए से इनके बीच की भिन्नताएं बिल्कुल ही गैर जरूरी है। जरूरी यह देखना है कि प्रस्थान बिन्दु क्या है?’’ (अनुभवसिद्ध आलोचना और भौतिकवाद)

और जहाँ तक हिडेन डाईमेंशन की बात है इसे एक कोरी गप कहंे तो ज्यादा बेहतर होगा। कईं लोगों ने यहां ‘भगवान’ या ‘शैतान’ के रहने की जगह ढूंढ निकाल ली है। स्पेस-टाइम की अवधारणा हम प्रकृति से निकाल सकते हैं न कि अपने गणितीय समीकरणों के लिए प्रकृति के ऊपर इन्हें थोपेंगे।




4. समाहारः ”संकट“ के कारक

आज का संकट भौतिकवाद के विरोध में खड़ी दार्शनिक धारा भाववाद और इसकी अलग-अलग शाखाओं जैसे कि नवकाण्टवाद, माखवाद, अज्ञेयवाद इत्यादि से जुड़ता है। जैसा कि हमने पहले बताया इस संकट का मूल कारण यह है कि यदि विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाला कोई व्यक्ति पहले से (एप्रायोरी) द्वन्द्वात्मक रुख़ नहीं अपनायेगा तो वह अज्ञेयवाद या नियतत्ववाद के गड्ढे में गिरने के लिए अभिशप्त होगा। दोनों किस्म के भटकावों के शिकार वैज्ञानिक अपनी-अपनी तरह से संकट की घोषणाएँ करेंगे। इस किस्म के ”संकट“ के संदर्भ में बात करते हुए लेनिन ने वैज्ञानिकों की इस धारणा को क्षणिक बताया था। उन्होंने इसे भौतिक भाववाद का नाम दिया था। लेनिन के इन कथनों को देखिये, ’’भौतिक भाववाद, भौतिकी के वैज्ञानिकों की धारा जो विष्व की वस्तुगत सच्चाई को नकारती है......... यह विज्ञान तथा भाव के बीच रिष्ता स्थापित करती है।......... यह बेशर्मी से भौतिकवाद को अपने दर्शन में मिश्रित करती रहती है।’’(अनुभवसिद्ध आलोचना और भौतिकवाद) आज इसे हम क्षणिक एवं अस्थाई न कहकर पूँजीवादी समाज के भीतर संस्थाबद्ध विज्ञान और वैज्ञानिकों की स्थाई परिघटना कह सकते हैं। यह स्वयं विज्ञान का संकट नहीं है। यह वैज्ञानिकों की पद्धति का संकट है। जैसा कि लेनिन ने कहा था, ‘‘भौतिकी की भौतिकवादी आधारभूत भावना सभी विज्ञानों की तरह, हर तरह के संकटों को पार कर लेगी, लेकिन सिर्फ तभी जब आधिभौतिकवाद को भौतिकवाद से विस्थापित कर दिया जाए।’’(अनुभवसिद्ध आलोचना और भौतिकवाद)
पर यह भौतिकवादी भावना आज भौतिकी के वैज्ञानिकों में स्वतःस्फूर्त नहीं पैदा हो सकती है। आज का ”संकट“ भी आधिभौतिकवाद, माखवाद, नवकान्टवाद की धाराओं के वैज्ञानिकों के विश्वविद्यालयों में पैठ बनाने और उस तरीके के कारण पैदा हुआ है जिस तरीके से विज्ञान का पठन-पाठन होता है। विज्ञान की पढ़ाई संस्थाबद्ध रूप में जैसे होती है, वह वास्तव में औद्योगिक उपयोग को ध्यान में रखकर ज़्यादा होती है। संस्थाबद्ध विज्ञान पर भाववादी और अज्ञेयवादी वैचारिक पूर्वाग्रहों का प्रभाव बहुत से कारणों से होता है। समाज में आम तौर पर अवैज्ञानिकता और अतार्किकता के प्रसार में आज सत्ता और व्यवस्था की दिलचस्पी है। इसलिए विज्ञान जहाँ तक उद्योग और मुनाफे की सेवा के लिए वहाँ तक उसमें वास्तविकता और ईमानदारी के लिए प्रोत्साहन है, लेकिन जहाँ विज्ञान विचारधारा, सिद्धान्त, दर्शन आदि के क्षेत्र में जाता है वहाँ उसमें हर प्रकार के प्रदूषण को व्यवस्था और सत्ता संस्थान घुसाते हैं। और एक अतार्किक समाज में अतार्किकता केवल शासक वर्गों के प्रयास और षड़यन्त्र से नहीं, बल्कि स्वतःस्फूर्त रूप से, वर्गीय कारणों से भी फैलती है। इसलिए आज का संकट वास्तव में विज्ञान का संकट नहीं है बल्कि व्यवस्था का और समाज का संकट है। और व्यवस्था और समाज का संकट ही विज्ञान के संकट में अभिव्यक्त हो रहा है।
इसलिए आज जो समस्याएँ और प्रश्न विज्ञान के समक्ष खड़े हैं उनका जवाब देने का सवाल भी एक स्तर पर सामाजिक परिवर्तन की परियोजनाओं से जुड़ जाता है। जिस समाज और व्यवस्था में हर गतिविधि, चाहे वह आर्थिक हो, वैज्ञानिक हो, राजनीतिक हो, सांस्कृतिक हो या सामाजिक हो, का प्रेरक तत्व मुनाफा और निजी लाभ हो, वह समाज और व्यवस्था संकट का शिकार अवश्यम्भावी तौर पर होगी और यह संकट उस समाज और व्यवस्था के रहते विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, विधि शास्त्र और ज्ञान की हर शाखा में अभिव्यक्त होगा। हम यह नहीं कहते कि विज्ञान एक सामाजिक निर्मिति है। निश्चित रूप से विज्ञान का एक स्वायत्त अस्तित्व है; लेकिन यह कहना कि विज्ञान पर उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सन्दर्भों का कोई असर नहीं पड़ता, किसी शुद्ध विज्ञान की कल्पना करना होगा, जो वास्तविकता में कभी भी कहीं भी मौजूद नहीं था, और कभी भी मौजूद नहीं था। यह अनायास नहीं है कि इतिहास में जब भी सामाजिक क्रान्तियाँ हुई हैं तो विज्ञान ने सदियों की दूरी कुछ दशकों में तय कर ली है। 15वीं से 17वीं शताब्दी तक यूरोप में हो रही उथल-पुथल के बिना हम वैज्ञानिक, तकनीकी और औद्योगिक क्रान्तियों की कल्पना नहीं कर सकते। निश्चित तौर पर, वैज्ञानिक तरक्की ने फिर सामाजिक-आर्थिक विकास की प्रक्रिया को भी प्रभावित किया। लेकिन जब तक पिछड़े सामाजिक सम्बन्ध मनुष्यों की रचनात्मकता और ऊर्जा को बाँधे रखेंगे और उसके विकास को बौना करते रहेंगे, तब तक विज्ञान को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी क्योंकि वैज्ञानिक भी मनुष्य ही हो सकता है, पशु नहीं। और मनुष्य निश्चित सामाजिक उत्पादन सम्बन्धों में बँधा होता है। आज सैद्धांतिक भौतिकी में काम करने वाले तमाम वैज्ञानिक यूं ही इस बात का रोना नहीं रोते कि ब्रह्माण्ड और प्रकृति से जुड़े अहम सवालों पर अनुसंधान के लिए कोई भी निवेश नहीं करना चाहता क्योंकि इसमें तात्कालिक तौर पर कोई मुनाफा नहीं होता। यह स्पष्ट रूप से पूँजीवादी समाज और व्यवस्था द्वारा विज्ञान की तरक्की को बेडि़यों में जकड़ना है। पूँजीवादी समाज के भीतर हर प्रकार के विकास की जो सम्भावनाएँ थीं, वे रिक्त हो चुकी हैं। अब अगर विज्ञान को भी अपने इस ”संकट“ को दूर करना है, तो उसे आज उस पूँजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया के संकट के समाधान के सवाल से सरोकार और सम्बन्ध रखना पड़ेगा, जिसकी कीमत मानवता अपना खून देकर चुका रही है। और इस संकट से पूँजीवाद-साम्राज्यवाद को मुक्त करने का एक ही रास्ता है-इस पूरी मानवद्रोही व्यवस्था को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया जाय। विज्ञान के कल्याण के लिए भी यही एकमात्र रास्ता है।


सन्दर्भ सूचीः
1. अनुभवसिद्ध आलोचना और भौतिकवाद - लेनिन
2. प्रकृति का द्वन्द्ववाद - एंगेल्स
3. ड्यूहरिंग मतखण्डन - एंगेल्स
4. डायलेक्टिक्स आॅफ नेचर, आॅन क्वाण्टम मैकेनिक्स - ताकेतानी
5. आॅब्ज़रवेशन प्राॅब्लम इन क्वाण्टम मैकेनिक्स - ताकेतानी
6. ताकेतानीज़ ‘थ्री स्टेज थियरी’ - सकाता
7. फिलाॅसफी एण्ड मेथडोलाॅजी आॅफ प्रेज़ेण्ट डे साइंस - सकाता
8. थियरी आॅफ स्पेस, टाइम एण्ड ग्रेविटेशन - फाॅक
9. मैजिक, मिस्ट्री एण्ड मैट्रिक्स - विटेन
10. अनरैवेलिंग स्ट्रिंग थियरी - विटेन
11. कैन क्वाण्टम मैकेनिकल डिस्क्रिप्शन आॅफ फिजि़कल रियैलिटी बी कम्प्लीट - आइंस्टीन, पोडोल्स्की, रोज़ेन
12. सर्न प्रेस रिलीज़
13. फाइनमैन लेक्चर सीरीज़
14. ट्रबल विद फिजि़क्स - स्मोलिनी



सनी, प्रशान्त
(साइण्टिस्ट्स फार सोसायटी)
प्रथम आह्वान पाठक सम्मलेन में प्रस्तुत पर्चा

दार्शनिक ब्लैक होल में गिरे विज्ञान जगत के नये प्रयोग!

हाल ही में विज्ञान जगत में ऐसी खोज हुई है जो विज्ञान के द्रष्टा आइन्सटीन की परिकल्पना को वास्तविकता में उतार लायी है। ब्लैक होल की तस्वीर क...